कथा आयोजन

भागवत कथा का महत्व –

भागवत पुराण वैष्णव सम्प्रदाय का सर्वश्रेष्ठ व प्रमुख ग्रन्थ है| हिन्दू समाज में भागवत पुराण अद्वितीय व आदरणीय पुराण है| श्री मद भागवत कथा सामाजिक,धार्मिक और लौकिक मर्यादाओं को स्थापित करने में सैकड़ों वर्षों से अपना महत्वपूर्ण योगदान देता आ रहा है| यह ज्ञान व विद्या का अतुलनीय व अक्षय भंडार है| श्री मद भागवत कथा में सकाम कर्म, निष्काम कर्म, ज्ञान साधना, सिद्धि साधना, भक्ति अनुग्रह, मर्यादा, द्वैत-अद्वैत, निर्गुण - सगुण तथा व्यक्त - अव्यक्त रहस्यों का समन्वय देखने को मिलता है| ज्ञान, भक्ति और वैराग्य से परिपूर्ण इस महान ग्रन्थ मे १२ स्कन्द है जो विष्णु भगवान के समस्त अवतारों का वर्णन करता है|

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पूज्य गोस्वामी श्री आनंदवल्लवभजी महाराज परिचय-

परम कृपालु प्रभु ठाकुर श्री बांकेबिहारीजी महाराज के प्राकट्यकर्ता संगीतशिरोमणि रसिकशेखर श्रीस्वामी हरिदासजी महाराज की परमोज्ज्वल वंश - परंपरा के देदीप्यमान नक्षत्र हैं; श्री मद्विष्णुस्वामी मतावलम्बी श्रीहरिदासीय संप्रदाय के आचार्य गोस्वामी श्रीआनंदवल्लभजी महाराज | श्रीमद्भागवत , रामायण आदि धर्मग्रंथों के सरस ओजस्वी कथाव्यास के रूप में लब्धप्रतिष्ठ आचार्यश्री ने संस्कृत एवं हिंदी - साहित्य की शिक्षा प्राप्त करने के साथ ही साहित्य , ज्योतिष , आयुर्वेद एवं योगादि विषयों का भी गंभीर अध्ययन किया है | आपके प्रपितामह नि. ब्रजवल्लभ गोस्वामीजी महाराज श्रीमद्भागवत , ज्योतिष एवं तंत्र - साधना के प्रकाण्ड विद्वान थे तथा आपके पितामह ब्रजविभूति नि. गोस्वामी श्री छबीलेवल्लभाचार्य जी महाराज (शास्त्री , साहित्यरत्न , साहित्यालंकार , ज्योतिष विशारद , काव्यकलाभूषण ) परम, भगवतभक्त , कवि तथा श्रीमदभागवत के सुविख्यात प्रवक्ता रहे एवं आचार्यश्री के पूज्य पिताश्री धर्मशास्त्र प्रवक्ता आचार्य श्रीललितवल्लभ गोस्वामी जी महाराज ' हरिदासपीठाधीश ' हरिदासीय संप्रदाय की गौरवशाली परंपरा की सत्रहवीं गद्दी के गद्दीस्थ के रूप में प्रतिष्ठित एवं पूजित हैं | इस प्रकार श्रीआनंदवल्लभजी महाराज परंपरा संपन्न भगवन्निष्ठ सुविख्यात महानुभाव हैं | आचार्य श्रीआनंदवल्लभजी महाराज को वक्तृत्व कला यूँ तो विरासत से ही प्राप्त है किन्तु श्री मद्भागवत आदि ग्रंथों के गूढ़ तत्वों की रसमयी विवेचना तथा गंभीर ओजस्वी शैली श्रीमद्भागवत - विश्व के परमवंदनीय महापुरुष से प्राप्त करने का सौभाग्य लाभ प्राप्त हुआ है | आचार्यश्री जब अपनी मधुर रसाप्लावित ओजपूर्ण वाणी में सदग्रंथों की ग्रंथियों का धारा - प्रवाह विवेचन प्रस्तुत करते हैं तो श्रोतावर्ग मंत्रमुग्ध हो भाव समाधी में गहरे उतर श्यामा - श्याम की दिव्य रस - मन्दाकिनी में अवगाहन कर रसमय हो जाते हैं | इसी का परिणाम है कि आचार्यश्री के श्रोताओं एवं शिष्यों का एक बड़ा वर्ग निरंतर आपकी वाणी का रसास्वादन कर भगवदोन्मुख हो जीवन की धन्यता प्राप्त कर रहा है | आइये श्रद्धा और प्रेम के साथ आचार्यजी द्वारा प्रवाहित भगवत रसधारा में अवगाहन करें |

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